रविवार, 17 मई 2026

फ्लेक्स फ्यूल गाड़ियों पर बढ़ी चिंता: सरकार के प्रयासों के बावजूद लॉन्चिंग अटकी, कंपनियां और तेल कंपनियां आमने-सामने।।



भारत सरकार देश में पेट्रोल पर निर्भरता कम करने के लिए फ्लेक्स फ्यूल गाड़ियां टेकरी से सड़क पर उतरने का प्लान कर रही है। लेकिन अब यह प्लान एक ऐसी उलझन बन गया है जैसे पहले मुर्गी आई या अंडा वाले पेंच में फस गया है।

 अगर ऑटोमोबाइल कंपनियों की बात करें तो सभी ऑटोमोबाइल कंपनियों बड़े पैमाने पर तब तक हाई एथेनॉल ब्लेंड वाली गाड़ियां बनाने को तैयार नहीं है जब तक बाजार में पर्याप्त मात्रा में फ्लेक्स फ्यूल उपलब्ध न हो। 

 फ्लेक्स फ्यूल क्या है? और भारत को इसकी जरूरत क्यों पड़ रही है।

 फ्लेक्स फ्यूल गाड़ियां सामान्य गाड़ियों से अलग होती है क्योंकि यह पेट्रोल के साथ किसी भी यात्रा में एथेनॉल मिक्स वाले पेट्रोल पर चल सकती हैं। अभी भारत में 20% एथेनॉल वाले E20 पेट्रोल अनिवार्य हैँ। सरकार अब E85 (85% एथेनॉल+ 15% पेट्रोल ) और E100 यानि 100% एथेनॉल जैसे फ्लेक्स फ्यूल की और बढ़ना चाह रही है। ताकि कच्चे तेल के आजाद को काम किया जा सके।

 इथेनॉल को गाने के रस, मक्का और सड़े हुए अनाज जैसे कृषि उत्पादों से बनाया जाता है। यह फ्यूल पर्यावरण में कार्बन के उत्सर्जन को बहुत कम कर सकता है। 28 फरवरी को मिडल ईस्ट में युद्ध शुरू होने के बाद कच्चे तेल की कीमत $70 से बढ़कर $100 प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। जिससे कि भारत के आयात बिल में बहुत तेजी से वृद्धि हो रही है। 

 एथेनॉल स्टॉक खराब होने का डर 

 एथेनॉल कंपनियों के सभी अधिकारियों का कहना है कि हाई एथेनॉल ब्लेंड वाले फ्यूल को लंबे समय तक स्टोर करना जोखिम भरा हो सकता है। अगर स्टॉक का प्रयोग तुरंत नहीं किया तो एथेनॉल सारी नामी सोच लेता है जिससे इंजन खराब होने या जंक लगने का खतरा हो सकता है। सभी कंपनियों का मानना है कि जब तक मांग सुनिश्चित नहीं होती तब तक स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना घाटे का सौदा हो सकता है।

 सरकार की प्राथमिकता है क्रूड इंपोर्ट कम करना 

 अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमत $100 प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। भारत अपनी जरूरत का करीब 90% तेल आयात करता है। लेकिन वित्त वर्ष 2026 में तेल आयात बिल पिछले साल के $137 बिलियन से घटकर $123 रह गया है। लेकिन भारत सरकार इसे और काम करना चाहती है।पीएम नरेंद्र मोदी ने भी ऊर्जा संकट को देखते हुए विकल्प ईंधन अपनाने पर जोर दिया है।

 माइलेज और कीमत बन सकती है रुकावट 

 एक्सपर्ट के मुताबिक तकनीक से ज्यादा बड़ी चुनौती फ्यूल की कीमत और माइलेज को लेकर है। इथेनॉल की एनर्जी और डेंसिटी कम होने के कारण फ्लेक्स फ्यूल वाहनों का माइलेज 20 से 30% तक काम कार सकती है। इस कमी की भरपाई के लिए फ्यूल की कीमत कम रखती होगी।

 कौन से देश में है पहले से ही फ्यूल फ्लेक्स गाड़ियां 

 एक्सपर्ट के मुताबिक सबसे पहले ब्राजील में 2003 में फ्लेक्स फ्यूल गाड़ियां आई और आज वहां 90% तक ज्यादा नई गाड़ियां इसी तकनीक पर चलती है। यह तकनीक यूनाइटेड स्टेट, कनाडा, स्वीडन जैसे शहरों में भी बहुत पहले से एक्टिव है।



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